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अप्रैल, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

यह ब्लॉग कहानी के लिए है पर जो कहानी 'अदम गोंडवी के इस गीत में है' पढ़िए -

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मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को                                              मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर मर गई फुलिया बिचारी कि कुएँ में डूब कर है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा मैं इसे कहता हूँ सरजूपार की मोनालिसा कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में क्या पता उसको कि कोई भेड़ि़या है घात में होनी से बेख़बर कृष्ना बेख़बर राहों में थी मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई छटपटाई पहले, फिर ढ...

कालेज का हेडमास्टर/प्रिंसिपल/प्राचार्य

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डॉ.लाल रत्नाकर    यह कहानी 'कहते हुए 'न' तो आनंद आएगा, 'न' दुःख होगा , न किसी को इसमें  छेड़ा गया है, पर ये कहानी एक ऐसी कहानी है जिसमे एक पढ़े लिखे आदमी की कथा है जिसे इतने हथकंडे आते है जिससे वह इतना माहिर था जितना कि कोई भी शातिर से शातिर अपराधी भी नहीं कर पाते है, जितना दिखाई देता है उससे कई हज़ार गुना शातिरपन उसमें है | पर वह हमेशा भोला भाला दिखाई देगा, देखकर किसी को नहीं लगेगा की यह इतना बड़ा अपराधी भी होगा  |                                    कहानी का   आज दयाल साहब रोज की तरह देर से आये है , डॉ. कानिया उन्हें सबूत आँख से तरेरने की हरकत की तैयारी करते से सकुचाये हुए अजीब सा मुह बनाते है, तभी दुखी राम बोल पड़ते है डॉ.दयाल आ गए यही क्या कम है डॉ.कानिया,..........डॉ.दयाल गुस्से में क्या कह रहा है यह कंचोदा......कानिया ही ही करते हुए अरे भाई मै तो कुछ कहाँ कह रहा हूँ, फिर डॉ.दयाल साले मै जानता हूँ तुम्हारी हरामगिरी तुम्हे दिखाई तो देता नहीं कहाँ गय...

एक कहानी यह भी है .............

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डॉ. लाल रत्नाकर  मा.एल. नाथ वैसे कहने को तो समाजवादी था पर वोट हमेशा सांप्रदायिक पार्टी को देता था क्योंकि उस पार्टी का कंडीडेट उसकी विरादरी का होता था, वैसे तो प्रजा और राजा वाला उसका आचरण अच्छा तो नहीं लगता था लेकिन चूँकि वह शिक्षक संगठन का जुगाडू प्रतिनिधि बन बैठा था और सबसे करीबी दिखाता था तो कभी कभार उसकी तरफ भी हो लेने का मन ना  होते हुए भी डॉ.बांगड़ू निकल ही जाता था उसके घर की ओर . संयोग था डॉ.बांगड़ू को भी नाइ से बाल ठीक कराने के लिए जाना था जब नाई के यहाँ पहुंचा तो आस पास के झुग्गी के बच्चो की लाईन लगी थी इतने सबेरे इतनी बड़ी बाल कटाने वालों  की लाईन देख डॉ.बांगड़ू  को कुछ समझ ना आया मोबइल में देखा अभी सात भी नहीं बजे थे, मा. एल. नाथ से मिले भी काफी दिन हो गए थे सो गाड़ी स्टार्ट किया और उसी मोहल्ले में रह रहे तथा कथित समाजवादी मा.एल.नाथ के यहाँ पहुँच गया, प्रदेश के समाजवादी शिक्षक संस्था के महामंत्री, अध्यक्ष और शहर के तथाकथित नेतानुमा एकाध उसके जी हुजूरी करने ...

एक कहानी यह भी है .............

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..  मा.एल. नाथ वैसे कहने को तो समाजवादी था पर वोट हमेशा सांप्रदायिक पार्टी को देता था क्योंकि उस पार्टी का कंडीडेट उसकी विरादरी का होता था, वैसे तो प्रजा और राजा वाला उसका आचरण अच्छा तो नहीं लगता था लेकिन चूँकि वह शिक्षक संगठन का जुगाडू प्रतिनिधि बन बैठा था और सबसे करीबी दिखाता था तो कभी कभार उसकी तरफ भी हो लेने का मन ना  होते हुए भी डॉ.बांगड़ू निकल ही जाता था उसके घर की ओर .  संयोग था डॉ.बांगड़ू को भी नाइ से बाल ठीक कराने के लिए जाना था जब नाई के यहाँ पहुंचा तो आस पास के झुग्गी के बच्चो की लाईन लगी थी इतने सबेरे इतनी बड़ी बाल कटाने वालों  की लाईन देख डॉ.बांगड़ू  को कुछ समझ ना आया मोबइल में देखा अभी सात भी नहीं बजे थे, मा. एल. नाथ से मिले भी काफी दिन हो गए थे सो गाड़ी स्टार्ट किया और उसी मोहल्ले में रह रहे तथा कथित समाजवादी मा.एल.नाथ के यहाँ पहुँच गया, प्रदेश के समाजवादी शिक्षक संस्था के महामंत्री, अध्यक्ष और शहर के तथाकथित नेतानुमा एकाध उसके जी हुजूरी करने वाले इत...